भोपाल में ‘पहली तारीख’ कार्यक्रम संपन्न

भोपाल। हर माह की तरह इस बार भी ‘पहली तारीख’ कार्यक्रम का आयोजन विविध कलाओं और संवेदनशील प्रस्तुतियों के साथ संपन्न हुआ। यह इस श्रृंखला का तेरहवाँ महीना रहा, जो निरंतरता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक बन चुका है। कार्यक्रम की शुरुआत सीमा बजाज और रवि द्वारा प्रस्तुत कबीर के प्रसिद्ध भजन “मैं मेरा घर झाड़ियां” से हुई, जिसने आत्मचिंतन और सहज जीवन के संदेश को दर्शकों के मन तक पहुंचाया।

इसके बाद संघमित्रा जी ने दो प्रस्तुतियाँ दीं—पहले उन्होंने भावपूर्ण अंदाज़ में लोकप्रिय गीत “ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा” गाया, और फिर ऊर्जावान शैली में एक पारंपरिक लावणी गीत प्रस्तुत किया, जिसने श्रोताओं को झूमने पर विवश कर दिया।

मौलश्री ने कवि कुंवर नारायण की गहन कविता “अंतिम ऊँचाई” का पाठ किया, जिसमें जीवन, मृत्यु और आत्मबोध के विषयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।

बालकृष्ण नामदेव जी ने महान गायिका बेगम अख्तर के जीवन और उनके संघर्षों पर आधारित एक संवेदनशील चर्चा प्रस्तुत की, जिससे श्रोताओं को कला और जीवन-संघर्ष के गहरे संबंध का अनुभव हुआ।

इसके बाद तत्संग बैंड ने ढाई आखर के साथियों द्वारा लिखा गया गीत “कदम बढ़ाओ” प्रस्तुत किया, जो सामाजिक बदलाव और एकता का प्रेरणादायक संदेश देता है।

मधु धुर्वे ने कबीर का गहन और भावप्रवण भजन “मोती समुद्र रा” प्रस्तुत किया, जो आत्मा की खोज और ज्ञान की गहराई की ओर संकेत करता है।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में अनिल और बिहू ने मिलकर महान कवि-संगीतकार भूपेन हज़ारिका का प्रसिद्ध गीत “गंगा क्यों बहती हो” प्रस्तुत किया, जिसने सामाजिक प्रश्नों और मानवीय संवेदनाओं को छू लिया।

अंत में, शैलेन्द्र शैली ने 1 जून 1949 के ऐतिहासिक प्रसंग को साझा किया, जब भोपाल आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बना। यह जानकारी कार्यक्रम को ऐतिहासिक संदर्भों से जोड़ते हुए विशेष अर्थ प्रदान करती है।

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